यकीन के काबिल नहीं CM महबूबा की पेशकश :

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लेख : रवि शुक्ला

म्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को कश्मीरी पंडितों से अपील की कि वह घाटी में आएं। उन्होंने कहा, ‘कश्मीरी पंडितों को कश्मीर का दौरा करना चाहिए, उनकी युवा पीढ़ियों को यह देखना चाहिए कि उनकी जड़ें वास्तव में कहां हैं।

हम सारी व्यवस्था करेंगे। जो कुछ भी अतीत में हुआ है वह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन अब हमें आगे बढ़ना होगा।’ मुख्यमंत्री ने दिल्ली में कश्मीरी पंडितों के साथ एक इंटरैक्टिव सत्र में ये बात कही।
इसी इवेंट में भीड़ से एक आदमी ने खड़ा होकर मुफ्ती से कश्मीरी पंडितों के लिए राहत पर सवाल उठाया। कट्टरपंथी इस्लामवादियों और आतंकवादियों द्वारा उत्पीड़न और धमकियों के बाद, कश्मीरी पंडितों ने 1990 के दशक में घाटी को छोड़ना शुरू कर दिया था।
इसके अलावा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करें। उन्होंने कहा, ‘मैं प्रधानमंत्री मोदी को वाजपेयी जी की तरह पाकिस्तान से बात करने का आग्रह करती हूं। न तो हम और न ही पाकिस्तान युद्ध लड़ने की स्थिति में हैं, दोनों देश जानते हैं कि अगर अब युद्ध होगा, तो कुछ भी नहीं बच पाएगा। दोनों देशों सब कुछ खो देंगे।’
2010 में जम्मू-कश्मीर सरकार ने कहा कि 808 पंडित परिवार घाटी में रह रहे थे। हालांकि वित्तीय और अन्य प्रोत्साहन दूसरों को वापस के लिए असफल रहे। जम्मू एवं कश्मीर सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में 1989 और 2004 के बीच इस क्षेत्र में 219 सदस्य मारे गए थे, लेकिन उसके बाद कोई भी नहीं। हालांकि, जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 215 मामलों को फिर से खोलने से इनकार कर दिया, जिसमें जम्मू-कश्मीर में 1989 में कश्मीरी पंडित समुदाय के 700 सदस्य मारे गए थे।
                 मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करें। लेकिन क्यों इस प्रश्न का शायद ही कोई वाजिब कारण महबूबा जी बता सकें। आखिर क्यों भारत एक नए धोखे के लिए नापाक पाक पर एक बार फिर भरोसा करे ? और रही बात पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तर्ज पर पाक से वार्ता शुरू करने की तो मैडम महबूबा जी गल्ती सुधारी जाती है नाकि उसे दोहराया जाता है। और निश्चय ही दोगले और गद्दार पाकिस्तान और तत्कालीन सैन्य तानाशाह पर यकीन करना अटल जी के जीवन की सबसे कष्टदायी भूल थी। जिसका मलाल अवश्य ही अटल जी को भी होगा।

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