चिनहट में ज़िक्र कर्बला का कार्यक्रम सकुशल सम्पन्न

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ब्यूरो:अर्शद
उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चिनहट क्षेत्र के विकल्प खण्ड गोमती नगर में हज़रत मौलवी अमीर अली शाह के दरगाह शरीफ पर ज़िक्र कर्बला कार्यक्रम सकुशल सम्पन्न किया गया। जिसमे एक मोहर्रम से लेकर दस मोहर्रम तक जिक्र हुआ। भारी संख्या में मजमा बना रहा हज़रत इमाम हुसैन का जिक्र शुरू होते ही वह मौजूद लोगो के आँखों में आशु निकल पड़े।

उस कार्यक्रम में दरगाह हज़रत मीरा शाह र० आ० के मुतवल्ली व सजादानशींन सय्यद मो० अतीक शाह ने जिक्र हुसैन शुरू किया तो मेफिल में आए हुए मजमे में लोगों के आशु नही थम पाए।

कर्बला (अरबी: كربلاء, कर्बला) मध्य इराक में एक शहर है, बगदाद के लगभग 100 किमी (62 मील) दक्षिण-पश्चिम में स्थित है, और कुछ मील की दूरी पर मिल्खा झील के पूर्व में स्थित है। करबला करबला की राजधानी की राजधानी है, और 1.15 मिलियन लोगों (2012) की अनुमानित आबादी है। करबला ईराक का एक प्रमुख शहर है। यहा पर इमाम हज़रत हुसैन ने अपने नाना हजरत मुहम्मद स्० के सिधान्तो की रक्षा के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया था। इस स्थान पर आपको और आपके लगभग पूरे परिवार और अनुयायियों को यजिद नामक व्यक्ति के आदेश पर सन् 680 (हिजरी 61) में शहीद किया गया था जो उस समय शासन करता था और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जेसे शराबखोरि, अय्याशी, वगरह लाना चाह्ता था।

यह क्षेत्र सीरियाई मरुस्थल के कोने में स्थित है। करबला शिया स्मुदाय में मक्का के बाद दूसरी सबसे प्रमुख जगह है। कई मुसलमान अपने मक्का की यात्रा के बाद करबला भी जाते हैं। इस स्थान पर इमाम हुसैन का मक़बरा भी है जहाँ सुनहले रंग की गुम्बद बहुत आकर्षक है। इसे 1801 में सऊदी के राजा के पूरवजो ने नष्ट भी किया था पर फ़ारस(ईरान) के लोगों द्वारा यह फ़िर से बनाया गया।

इमाम हुसैन (हुसैन बिन अली) के इस बलिदान को मुस्लिम मुहर्रम के रूप में आज भी याद करते हैं।

बताया कि यजीद जब शासक बना तो उसमें तमाम तरह के अवगुण मौजूद थे। वह चाहता था कि इमाम हुसैन उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि करें, लेकिन हजरत मुहम्मद के वारिसों ने उसे इस्लामी शासक मानने से साफ इनकार कर दिया था। ऐसे में इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर अपने परिवार व कुछ चाहने वालों के साथ इराक जा रहे थे। इस्‍लाम की मान्‍यताओं के अनुसार हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ दो मोहर्रम को कर्बला पहुंचे थे। यजीद अपने सैन्य बल के दम पर हजरत इमाम हुसैन और उनके काफिले पर जुल्म कर रहा था। उस काफिले में उनके परिवार सहित कुल 72 लोग शामिल थे। यजीद ने उन सबके लिए 7 मुहर्रम को पानी की बंद कर दिया था। नौवें मोहर्रम की रात हुसैन ने अपने साथियों कहा कि, ‘यजीद की सेना बड़ी है और उसके पास एक से बढ़कर एक हथियार हैं। ऐसे में बचना मुश्किल दिखाई दे रहा है। मैं तुम्‍हें यहां से चले जाने की इजाजत देता हूं। ‘ लेकिन कोई हुसैन को छोड़कर नहीं गया और मुहर्रम की 10 वीं तारीख को यजीद की सेना ने हुसैन की काफिले पर हमला कर दिया। शाम होते – होते हुसैन और उनका काफिला शहीद हो गया। शहीद होने वालों में उनके छः महीने की उम्र के पुत्र हज़रत अली असग़र भी शामिल थे।

कार्यक्रम में शान्ति व्यवस्था के लिए पुलिस भी शामिल रही।

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