उत्तर-प्रदेश में धूमधाम से मनाया गया जुलूस ए मोहम्मदी, सभी धर्म के लोगों ने दिया एकता का परिचय

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उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ शहर के कोने-कोने में बड़ी धूमधाम से बारावफात मनाया गया जिसमें सभी धर्म के लोग भी शामिल रहे।

बताते चलते है कि इस त्योहार को मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत महत्वपूर्ण तरीके से मानते है जिसमे अपने पूरे परिवार के साथ जुलूस ए मोहम्मदी में शामिल होते है।

बारावफात या फिर जिसे मीलाद उन नबी के नाम से भी जाना जाता है, यह दिन इस्लाम मजहब का एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि इसी दिन इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था और इसके साथ ही इसी तारीख को उनका देहांत भी हुआ था।

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 12 रबी अल अव्वल की तारीख को पड़ने वाले इस दिन को पूरे विश्व भर के विभिन्न मुस्लिम समुदायों द्वारा काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग मस्जिदों में जाकर नमाज अदा करते हुए, मोहम्मद साहब के दिखाये हुए रास्ते को अपनाने का संकल्प लेते है।

बारावफात क्यों मनाया जाता है? (हम क्यों मनाते हैं बारावफात – मिलाद-उन-नबी)

बारावफात या फिर जिसे ‘ईद ए मीलाद’ या ‘मीलादुन्नबी’ के नाम से भी जाना जाता है, ईस्लाम धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। पूरे विश्व भर में मुसलमानों के विभिन्न समुदायों द्वारा इस दिन को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है क्योंकि मानवता को सच्चाई और धर्म का संदेश देने वाले पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब का जन्म इसी दिन हुआ था और इसी तिथि को उनकी मृत्यु भी हुई थी। । ऐसा माना जाता है कि अपने व्यवस्थाकाल से पहले मोहम्मद साहब बारह दिनों तक बीमार थे।

बारा का मतलब होता है बारह और वफात का मतलब होता है व्यवस्थागत और क्योंकि बारह दिनों तक बीमार रहने के पश्चात इस दिन उनकी व्यवस्थाकाल हो गई थी इसलिए इस दिन को बारावफात के रूप में मनाया जाता है। यहीं कारण है कि इस्लाम में बारावफात को इतने उत्साह के साथ मनाया जाता है।

इसके साथ ही इस दिन को ईद ए मीलादुन्नबी के नाम से भी जाना जाता है। जिसका मतलब होता है मुहम्मद के जन्म का दिन क्योंकि मोहम्मद साहब का जन्म भी इसी दिन हुआ था। यही कारण है कि शिया जैसे मुस्लिम समुदाय द्वारा इस दिन को मनाने और उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।

बारावफात कैसे मनाया जाता है – रिवाज और परंपरा

बारावफात के इस पर्व को मनाने को लेकर शिया और सुन्नी समुदाय के अपने अलग-अलग मत है। जिसके कारण यह विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। इस दिन मुस्लिमों के विभिन्न समुदायों द्वारा पैगम्बर मोहम्मद के द्वारा उल्लेख किए गए विचारों और विचारों को याद किया जाता है और कुरान का पाठ किया जाता है।

इसके साथ ही बहुत सारे लोग इस दिन मक्का मदीना या फिर दरगाहों जैसे प्रसिद्ध इस्लामिक दर्शन स्थलों पर जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन को नियम से मानता है। वह अल्लाह के साथ ही लगभग हो जाता है और उसे अल्लाह की विशेष रहमत प्राप्त होती है।

इस दिन रात भर प्रार्थनाएं की जाती है, सभाओं का आयोजन किया जाता है। तमाम प्रकार के जुलुस निकाले जाते है। इस हजरत मोहम्मद साहब के जन्म की खुशी में जो गीत गाया जाता है, उसे मौलूद कहा जाता है। इस संगीत को लेकर ऐसा माना जाता है कि इस संगीत को सुनने वाले को स्वर्ग नसीब होता है। इसके साथ ही इस दिन लोगो द्वारा उनके जयंती की खुशी में मिठास भी बांटी जाती है।

इस त्योहार में चिनहट क्षेत्र में जुलूस निकाल कर दरगाह हजरत सैयद शहीद मीरा शाह पहलवान रहमतुल्ला अलैह के मुतवल्ली व सज्जादा नशीन सैयद मोहम्मद अतीक शाह ने सभी समुदाय के लोगों को हार-माला व मिठाइयां खिलाकर एकता का परिचय देते हुए सभी लोगों को जुलूस ए मोहम्मदी में शामिल किया जिससे चिनहट क्षेत्र में आज फिर एकता का परिचय देखने को मिला।

वही दूसरी तरफ चिनहट के प्रशिद्ध हिन्दू समुदाय मंदिर छोहरिया माता के महन्त लल्ला बाबा भी शामिल रह कर एकता की मिशाल भी पेश की और बताया कि हमारे चिनहट क्षेत्र में कोई भी उत्सव हो तो यहा सभी धर्म के लोग मिलकर मानते है और एकता का परिचय भी देते है मैं अपने क्षेत्रवासियों का अभिनंदन करता हूं और स्वागत करता हूं कि सदा इसी तरह से दोनों समुदाय के बीच में भाईचारा और मोहब्बत बना रहे।

वही भारी मात्रा में जुलूस ए मोहम्मदी को सकुशल बनाये रखने के लिए चिनहट पुलिस भी मौजूद रही जिसमे चिनहट कोतवाली प्रभारी निरीक्षक सचिन कुमार सिंह व कस्बा चौकी प्रभारी सुरेश कुमार पांडेय को भी कार्यक्रम में सम्मानित किया गया।

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